Friday, January 18, 2019

Fact About maharana Pratap In Hindi

Hindi Facts about Maharana Pratap


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भाला 80 तो 71 किलो का कवच-
हकीकत में एक आदमी इतना वजन उठा कर हिल भी नहीं सकता, लेकिन ये सही है की महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) का भाला 81 किलो का था और उनका छाती का कवच 72 किलो का था। उनका भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। ये आज भी मेवाड़ राजघराने के म्यूजियम में सुरक्षित है।

एक वार से कर देते थे दुश्मन के दो टुकड़े-
इतिहासकार लिखते है कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)ने बहलोल खां पर ऐसा वार किया कि सिर से घोड़े तक के दो टुकडें कर दिए थे।

हवा में उडाता था चेतक-
दरअसल ऐसा चेतक गति की वजह से कहा जाता है। जब वह दौड़ता था तो उसके पैर जमीन पर पड़ते दिखाई नहीं देते थे। हल्दीघाटी युद्ध में उसने मानसिंह के हाथी के सिर तक उछलकर पैर रख दिया था। जब प्रताप घायल हुए तो वह 26 फ़ीट लंबे नाले को लांघ गया।

घास की रोटी खाकर गुजारे थे दिन-
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने मायरा की गुफा में घास की रोटी खाकर दिन गुजारे थे। इस का जिक्र कई किताबों के अलावा राजस्थान की लोक कथाओं में है। गुफा आज भी मौजूद है। हल्दी घाटी युद्ध के समय इसी गुफा में प्रताप ने अपने हथियार छुपाए थे। यहां एक मंदिर भी मौजूद है।

अकबर के खिलाफ खड़ा हो गया पठान-
हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की सेना की कमान हकीम खान के हाथ में थी। वे अफगानी मुस्लिम पठान थे। अकबर के खिलाफ वे प्रताप की सेना के सेनापति के रूप में लड़े थे।

दुश्मन के लिए भी तलवार रखते थे महाराणा प्रताप-
महाराणा को शिक्षा मां जयवंता बाई ने दी थी। वे उन्ही की सलाह पर दो तलवारें रखते थे। जिससे निहत्थे दुश्मन को भी बराबरी का मौका मिल सके।


सपने में भी प्रताप से डर जाता था अकबर-
हल्दीघाटी का युद्ध इतना विनाशकारी रहा की अकबर इसका ख्वाब देख जाग जाय करता था। वीर रस की कविताओं में यह उसके डर के रूप में प्रचलित हो गया। बता दें कि इसी लड़ाई में मुगलों का अजेय होने का भ्रम टूटा था। इतिहासकार जेम्स टॉड ने इसकी तुलना थर्मोपॉली के युद्ध से की थी।

बिना सिर लड़ा था प्रताप का सेनापति-
महाराणा-अकबर की सेना के बीच युद्ध में मेवाड़ का सेनापति हकीम खान सूर का सिर धड़ से अलग हो गया था। बावजूद वो योद्धा की तरह कुछ देर लड़ते रहे। हालांकि, इसकी सच्चाई पर सवाल है, पर राजस्थानी लोकगीतों में उनकी इस बहादुरी का जिक्र हैं। जहां मौत हुई थी, वहां उनकी समाधि आज भी मौजूद है।

जब अकबर ने दिया महाराणा को एक प्रस्ताव-
अकबर ने प्रताप के सामने प्रस्ताव रखा था कि अगर महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) उनकी सियासत को स्वीकार करते है, तो आधे हिंदुस्तान की सत्ता महाराणा प्रताप को दे दी जाएगी लेकिन महाराणा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। लगातार 30 वर्षों तक प्रयास करने के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी नहीं बना सका।

महाराणा प्रताप की मौत पर रो पड़ा था अकबर-
30 वर्षों तक लगातार प्रयास के बाबजूद अकबर, प्रताप को बंदी न बना सका। वह प्रताप की बहादुरी का कायल था। कई लोकगीतों में इस बात का जिक्र है कि महाराणा की मौत की खबर सुनकर अकबर की आँखें भी नम हो गई थी।

हल्दीघाटी की लड़ाई-
महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच हल्दीघाटी का महायुद्ध 1576 ई. लड़ा गया। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में सिर्फ 20000 सैनिक तथा अकबर की सेना के 85000 सैनिक थे। अकबर की विशाल सेना और संसाधनों की ताकत के बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और मातृभूमि के सम्मान के लिए संघर्ष करते रहे। हल्दीघाटी का युद्ध इतना भयंकर था कि युद्ध के 300 वर्षों बाद भी वहां पर तलवारें पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 को हल्दीघाटी में मिला

दिवेर का युद्ध-
1582 में दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना ने मुगलों को बुरी तरह पराजित करते हुए चित्तौड़ को छोड़कर मेवाड़ की अधिकतर जमीन पर दोबारा कब्जा कर लिया।

वचन की पालना
एक किवदंती है कि महाराणा प्रताप ने अपने वंशजों को वचन दिया था कि जब तक वह चित्तौड़ वापस हासिल नहीं कर लेते, तब तक वह पुआल पर सोएंगे और पेड़ के पत्ते पर खाएंगे। आखिर तक महाराणा प्रताप (Maharana Pratap)को चित्तौड़ वापस नहीं मिला। उनके वचन का मान रखते हुए आज भी कई राजपूत अपने खाने की प्लेट के नीचे एक पत्ता रखते हैं और बिस्तर के नीचे सूखी घास का तिनका रखते हैं।

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